Tuesday, October 25, 2016

प्रेम

















दिल की पीड़ा में हर रोज अब जल रहा हूँ मैं
प्रेम की आग मे तप के कैसा ढल रहा हूँ मैं
इतंजार के तीर ने मुझे कर दिया है घायल
हर पल इश्‍क से जिंदगी को छल रहा हूँ मैं
प्रेम से ही मुश्किलों को दूर कर रहा हूँ मैं
अपनों के बीच में भी कैसे भला डर रहा हूँ मैं
इस आग में जलने का अब गम नही है मुझे 
प्रेम से ही अपनों के कष्‍टों को हर रहा हूँ मैं 

________________अभिषेक शर्मा अभि

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